-भगवान मानवता के कल्याण हेतु लेते हैं अवतार श्री राम कथा के द्वितीय दिवस पर गूंजा संदेश
देहरादून। देवभूमि देहरादून में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित भव्य श्री राम कथा के द्वितीय दिवस पर वातावरण भक्ति, उत्सव, आध्यात्मिक चेतना एवं दिव्य अनुभूतियों से सराबोर हो उठा। कथा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में कथा व्यास साध्वी दीपिका भारती जी ने “प्रभु राम के अवतरण की बेला हुई है आज फिर” विषय पर ऐसी अमृतमयी कथा प्रस्तुत की, जिसने श्रद्धालुओं को केवल श्रीराम के जन्मोत्सव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके भीतर राम चेतना को जागृत करने का दिव्य संदेश दिया।
द्वितीय दिवस का मुख्य आकर्षण श्री राम प्राकट्य उत्सव रहा। कथा व्यास जी ने अत्यंत सुंदर भावों में समझाया कि भगवान के लिए “जन्म” शब्द नहीं, बल्कि “प्राकट्य” शब्द का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि परमात्मा सामान्य जीवों की भांति जन्म नहीं लेते और न ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य परमात्मा के समीप रहकर भी उन्हें पहचान नहीं पाता। वास्तविक अध्यात्म तब प्रारंभ होता है जब मनुष्य परमात्मा को केवल कथा, मूर्ति या परंपरा में नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभूति में पहचानने लगता है। कथा के दौरान साध्वी जी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के एक और अत्यंत गहन संदेश को साझा करते हुए कहा – भगवान चाहे मथुरा में जन्म लें या अयोध्या में, जब तक भगवान आपके भीतर जन्म नहीं लेते, तब तक आपके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
इस भाव को विस्तार देते हुए उन्होंने अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया कि यदि मंदिर में दीपक जल रहा है, तो उसका प्रकाश केवल मंदिर तक सीमित रहेगा। जब तक अपने घर में दीपक नहीं जलेगा, अंधकार दूर नहीं होगा। उसी प्रकार श्रीराम का वास्तविक अवतरण तब सार्थक होता है, जब उनके प्रकाश का जन्म मनुष्य के भीतर हो। यह संदेश आज के तनावग्रस्त, दिशाहीन और भीतर से रिक्त होते समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत हुआ।
कथा में माता पार्वती द्वारा भगवान शिव से पूछे गए उस शाश्वत प्रश्न का भी वर्णन हुआ भगवान मानव रूप में अवतार क्यों लेते हैं? कथा व्यास जी ने बताया कि जब-जब धर्म की हानि होती है और मानवता मार्ग भूल जाती है, तब परमात्मा अवतरित होकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं।
अश्वमेध यज्ञ, गर्भाधान संस्कार तथा दिव्य खीर प्रसंग के माध्यम से श्रीराम एवं उनके भाइयों के प्राकट्य की कथा को केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संकेतों के रूप में समझाया गया। इसके पश्चात “भए प्रकट कृपाला” की पारंपरिक प्रस्तुति ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
चैत्र मास से जुड़ी लोक परंपराओं को भी अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। फुलारी गीतों के माध्यम से वह भाव जीवंत हो उठा, जिसमें बच्चे फूल चुनकर घर-घर उत्सव मनाते हैं। गढ़वाली लोकगीतों एवं भक्तिमय नृत्य ने ऐसा प्रतीत कराया मानो सम्पूर्ण देहरादून अयोध्या बन गया हो।
कथा के अत्यंत प्रभावशाली क्षणों में से एक वह था जब साध्वी जी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के इन वचनों को दोहराया – भगवान इसलिए अवतार नहीं लेते कि मनुष्य उनकी मूर्ति बनाकर मंदिरों में पूजा करे। भगवान अवतार लेते हैं मानवता में क्रांति, समाज में परिवर्तन और विश्व व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए।
उन्होंने कहा कि आज भी समय राम के पुनः अवतरण का है, किन्तु यह अवतरण बाहरी नहीं, बल्कि मानव के अंतरजगत में होना चाहिए। मानव शरीर ही चैतन्य भगवान का मंदिर है, और जब तक भीतर की ज्योति प्रज्ज्वलित नहीं होगी, तब तक बाहरी कर्मकांड समाज को नहीं बदल सकते।
रामकथा और देवभूमि की पावन धरा के आध्यात्मिक संबंध को और अधिक गहन बनाते हुए, कथाव्यास जी ने उत्तराखंड से जुड़ी अनेक अल्पज्ञात किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण कथाओं का उल्लेख किया, जो आज भी सनातन संस्कृति की जीवंत चेतना को संजोए हुए हैं।
आगे बढ़ते हुए, कथा में चारधाम यात्रा, पंच केदार, पंच प्रयाग एवं पंच बद्री के आध्यात्मिक महत्व का भी गहन विवेचन किया गया। उन्होंने बताया कि ये तीर्थ केवल बाहरी यात्राएँ नहीं, बल्कि आत्म के उत्सर्ग की आंतरिक यात्राएँ हैं। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंतन व्यक्त किया कि आज तीर्थयात्राएँ धीरे-धीरे पर्यटन, दृश्य आकर्षण और बाहरी आडंबरों तक सीमित होती जा रही हैं।
इसी संदर्भ को उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत से जोड़ते हुए उन्होंने आदि शंकराचार्य द्वारा केदारनाथ के समीप स्थापित ज्योतिर्मठ का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि “ज्योति” अर्थात अंतर्मन की दिव्य चेतना और आत्मप्रकाश का वास्तविक भाव आज धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। वर्तमान समय में धार्मिक अनुष्ठान, प्रतीक, भीड़ और बाहरी धार्मिक स्वरूप तो दिखाई देते हैं, किंतु चेतना के जागरण की खोज नहीं की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंतरिक अध्यात्म से यह दूरी ही आज समाज में बढ़ते तनाव, अशांति, संघर्ष और भावनात्मक असंतुलन का मूल कारण है।
प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का वर्णन भी अत्यंत भावपूर्ण रहा, जिसने श्रद्धालुओं के हृदय को भक्ति एवं प्रेम से भर दिया। कथा के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि दिव्यता केवल चमत्कारों में नहीं, बल्कि सरलता, प्रेम, मर्यादा और करुणा में भी प्रकट होती है।
कथा में अतिथि के रूप में श्रीमती सविता कपूर जी, मा0 विधायक, कैंट विधानसभा, देहरादून के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। मधुर भजनों, कीर्तनों एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत लोक प्रस्तुतियों ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया, जिससे श्रद्धालु दिव्य आनंद में सराबोर हो उठे। सात दिवसीय श्रीराम कथा का शुभारंभ 18 मई 2026 को हुआ, जो 24 मई 2026 तक निरंतर आयोजित की जाएगी। यह दिव्य कथा प्रतिदिन सायं 5 बजे से आयोजित हो रही है।