देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में आयोजित श्रीराम कथा का तृतीय दिवस भक्ति, दर्शन, लोक परंपराओं, भजनों एवं गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों से ओत-प्रोत रहा, जहाँ संस्कृति और चेतना का अद्भुत संगम साकार होता दिखाई दिया।
“राम सिया की दिव्य कहानी, रामायण जगत कल्याणी” विषय पर कथाव्यास साध्वी दीपिका भारती जी की भावपूर्ण एवं ओजस्वी व्याख्या के माध्यम से श्रद्धालुओं ने अनुभव किया कि रामकथा मानव जीवन के प्रत्येक संस्कार, प्रत्येक संबंध, प्रत्येक भाव और प्रत्येक आध्यात्मिक आकांक्षा में सूक्ष्म रूप से गुंथी हुई एक जीवंत चेतना है।
कथा का प्रवाह श्रीराम एवं उनके भ्राताओं के गुरुकुल जीवन से आरंभ हुआ। “गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्प काल विद्या सब पाई।” चौपाई के माध्यम से यह भाव प्रस्तुत किया गया कि किस प्रकार अल्पायु में ही श्रीराम ने समस्त विद्याओं को आत्मसात कर लिया। कथा व्यास जी ने अत्यंत सूक्ष्मता से उस प्रसंग को सामने रखा, जिसका उल्लेख सामान्यतः कम सुनने को मिलता है – श्रीराम की वैराग्य लीला।
उन्होंने बताया कि सोलह वर्ष की आयु में दीक्षांत समारोह के उपरांत श्रीराम के भीतर जीवन के उद्देश्य को लेकर गहन प्रश्न जागृत हुए। यह प्रसंग योग वशिष्ठ अथवा महा रामायण में आता है, जहाँ श्रीराम संसार की क्षणभंगुरता, जीवन के अर्थ और मानव अस्तित्व के वास्तविक उद्देश्य पर चिंतन करते दिखाई देते हैं। कथा व्यास जी ने कहा कि आज भी मनुष्य के जीवन में अनेक प्रश्न हैं, परंतु वे अधिकतर सुविधा, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता से जुड़े हैं। जबकि रामायण के प्रश्न मनुष्य को जीवन के उद्देश्य, चेतना और आत्मिक सत्य की ओर ले जाते हैं। यही प्रश्न अंततः मनुष्य को भीतर की यात्रा के लिए तैयार करते हैं।
इसी वैराग्य से आगे श्रीराम के विराट मिशन की भूमिका निर्मित होती है। कथा में बताया गया कि श्रीराम का प्राकट्य केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक कथा नहीं था, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना हेतु एक व्यापक दिव्य योजना थी। इसी क्रम में श्रीराम विश्वामित्र जी के साथ ताड़का वन की ओर प्रस्थान करते हैं। कथा व्यास जी ने इस प्रसंग को श्रीराम के विराट मिशन का “पायलट मॉडल” बताते हुए समझाया कि यहाँ दो महत्वपूर्ण कार्य एक साथ हुए – दुष्टों का दलन और भक्तों का उद्धार।
ताड़का एवं असुर शक्तियों के विनाश के साथ-साथ अहिल्या उद्धार के प्रसंग को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया। कथा में समझाया गया कि अहिल्या केवल एक पात्र नहीं, बल्कि जड़ हो चुकी मानव चेतना का प्रतीक हैं, जिसे प्रभु के स्पर्श से पुनः जागृति प्राप्त होती है। वहीं यज्ञ परंपरा की पुनर्स्थापना को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज में सात्विक ऊर्जा, संतुलन और धर्म आधारित जीवनशैली की वापसी के रूप में प्रस्तुत किया गया।
कथा का वातावरण धीरे-धीरे जनकपुरी के उल्लासमय विवाहोत्सव में परिवर्तित हो गया। जैसे-जैसे श्रीराम और माता सीता के विवाह प्रसंग आगे बढ़े, पूरा पंडाल भक्ति, लोक संस्कृति और भावनात्मक आनंद से भर उठा। विशेष रूप से गढ़वाली परंपराओं के माध्यम से विवाह उत्सव की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ दिया।
न्योतो की लोक परंपरा में “सगुनी कागा सगुन बोलतू…” जैसे मांगल गीतों के माध्यम से विवाह का निमंत्रण दिया गया। इसके पश्चात हल्दी बाँध, मंगल स्नान, कपड़ा पहरावण, धूली अर्घ, फेरा भावरा और बिदाई जैसे पारंपरिक गढ़वाली विवाह संस्कारों को अत्यंत जीवंत और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो जनकपुरी स्वयं देवभूमि में अवतरित हो गई हो। लोकधुनों, मंगल गीतों और भक्तिमय उल्लास के बीच श्रद्धालु श्री राम जानकी विवाह के सहभागी बन चुके थे।
इसी प्रसंग के मध्य कथा व्यास जी ने एक अत्यंत सुंदर और आत्मीय भाव साझा किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य दूसरों की विवाह एल्बम बार-बार नहीं देख सकता, क्योंकि उससे उसका कोई आंतरिक संबंध नहीं होता। लेकिन अपनी एल्बम को मनुष्य अनगिनत बार देखता है, क्योंकि उसमें उसका अपना जीवन, अपना प्रेम और अपनी स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीराम और माता सीता का विवाह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा की अपनी दिव्य प्रेम कहानी है। यही कारण है कि रामायण को बार-बार सुनने पर भी मनुष्य कभी ऊबता नहीं; हर बार उसमें एक नया आनंद, नई अनुभूति और नया आत्मिक संबंध अनुभव होता है।
इसके बाद कथा व्यास जी ने देवभूमि उत्तराखंड के शक्तिपीठों का उल्लेख करते हुए आत्मा और परमात्मा के दिव्य मिलन को भीतर के आध्यात्मिक विज्ञान से जोड़ा। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार बाहरी जगत में शक्तिपीठ हैं, उसी प्रकार मानव शरीर के भीतर भी सात ऊर्जा केंद्र विद्यमान हैं। जब आत्मा का परमात्मा से “गठबंधन” होता है, तब चेतना की उर्ध्वमुखी यात्रा प्रारंभ होती है। यही वास्तविक दिव्य विवाह है, जिसका प्रतीक ब्रह्मज्ञान है।
उन्होंने समझाया कि रामायण केवल इतिहास का पुनर्कथन नहीं, बल्कि मानव चेतना के रूपांतरण की प्रक्रिया है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित यह श्री राम कथा जीवन में आंतरिक परिवर्तन, चेतना जागरण और आत्मिक अनुभूति का एक दिव्य अभियान है।
मधुर भजनों, कीर्तनों एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत लोक प्रस्तुतियों ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया, जिससे श्रद्धालु दिव्य आनंद में सराबोर हो उठे। कथा में अतिथि के रूप में श्री अशोक वर्मा जी (राज्यमंत्री उपाध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण), श्री गौरव कुमार (प्रदेश अध्यक्ष शिवसेना उत्तराखंड), अधिवक्ता श्री राकेश गुप्ता (पूर्व अध्यक्ष उत्तराखंड बार एसोसिएशन देहरादून), श्री रमेश कुमार मंगू (पूर्व पार्षद टर्नर रोड़), श्रीमती कुसुम वर्मा(पार्षद टर्नर रोड़), श्री मणिराम नौटियाल (प्रदेश संगठन प्रमुख सहकारी भारती देहरादून), श्री बी॰पी॰ खंडूरी एवं श्री वीर सिंह पँवार जी के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। सात दिवसीय श्रीराम कथा का शुभारंभ 18 मई 2026 को हुआ, जो 24 मई 2026 तक निरंतर आयोजित की जाएगी। यह दिव्य कथा प्रतिदिन सायं 5 बजे से आयोजित हो रही है।