नाबार्ड–नाबकॉन्स की पहल से उत्तराखंड के सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट आधारित कृषि आय वृद्धि की दिशा में बड़ा कदम

देहरादून। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) एवं NABCONS की पहल पर कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं को लेकर उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। दिनांक 9 अप्रैल 2026 को सचिव, जलागम के साथ बैठक आयोजित की गई, जिसमें माह फरवरी में सारा जलागम के साथ कार्बन क्रेडिट की फिजिबिलिटी स्टडी हेतु हुए अनुबंध के क्रम में आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किए गए।

बैठक में सचिव श्री जावलकर ने निर्देशित किया कि उत्तराखंड राज्य में प्रथम बार सारा के अंतर्गत देहरादून एवं टिहरी जनपद की सॉंग नदी पर कृषकों की आय बढ़ाने हेतु कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं एवं उसके विपणन (मार्केटिंग) पर एक विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट तैयार की जाए। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट इस प्रकार तैयार की जाए कि इसे संबंधित विभागों के लिए एक न्यूनतम प्रोटोकॉल एवं दिग्दर्शिका के रूप में अपनाया जा सके तथा आवश्यक कार्यवाही के तहत व्यापक रूप से प्रचारित किया जा सके।

इस अवसर पर नाबकॉन्स दिल्ली टीम, नाबार्ड देहरादून के डीजीएम, सारा के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीमती कहकशाँ, उपनिदेशक सारा डॉ. डी.एस. रावत, विषय विशेषज्ञों सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

इसके अतिरिक्त, दिनांक 10 अप्रैल को टिहरी जनपद के रिंगलगढ़ क्षेत्र में देहरादून जिला सारा के विषय विशेषज्ञों एवं नाबकॉन्स की टीम द्वारा संयुक्त क्षेत्र भ्रमण किया गया। इस दौरान पिरुल (चीड़ की पत्तियों) से निर्मित बायोचार में उपलब्ध कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं तथा सॉंग नदी बेसिन में इसके व्यापक उपयोग एवं लाभों के अध्ययन के उद्देश्य से ग्रामीणों के साथ संवाद स्थापित किया गया।

यह पहल क्षेत्रीय स्तर पर किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास मानी जा रही है।

सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट की संभावनाएँ

उत्तराखंड के सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट के माध्यम से किसानों और ग्रामीण समुदाय की आय बढ़ाने की दिशा में एक व्यापक अध्ययन प्रारम्भ किया गया है। यह अध्ययन विशेष रूप से एग्रोफॉरेस्ट्री (कृषि वानिकी), बायोचार, मृदा कार्बन (SOC) तथा पिरुल आधारित ब्रिकेट्स जैसे उपायों पर केंद्रित है, जिनके माध्यम से जलवायु परिवर्तन शमन के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ किया जा सकता है।

1. एग्रोफॉरेस्ट्री (Agroforestry) में कार्बन क्रेडिट की संभावनाएँ

एग्रोफॉरेस्ट्री के अंतर्गत खेतों की मेड़ों, परती भूमि तथा कृषि भूमि में पेड़-पौधों का रोपण किया जाता है। यह प्रणाली दोहरे लाभ प्रदान करती है—एक ओर किसानों को लकड़ी, फल, चारा एवं अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैं, वहीं दूसरी ओर पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर उसे अपने जैवभार में संग्रहीत करते हैं।

सॉंग नदी बेसिन में शीशम, सागौन, बांस, फलदार वृक्ष (आम, लीची, अमरूद) जैसे प्रजातियों के माध्यम से प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष 2 से 8 टन CO₂ तक कार्बन अवशोषण की संभावना आंकी जा रही है। इस संचित कार्बन को अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार में क्रेडिट के रूप में बेचकर किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।

2. मृदा कार्बन (SOC – Soil Organic Carbon) का महत्व

मृदा कार्बन (SOC) खेती की उत्पादकता और कार्बन संचयन दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैविक खेती, हरी खाद, फसल अवशेष प्रबंधन और कम जुताई (minimum tillage) जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

SOC में वृद्धि से:
• मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है
• जल धारण क्षमता में सुधार होता है
• कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होते हैं

सॉंग नदी बेसिन में यदि बड़े स्तर पर SOC सुधार कार्यक्रम लागू किए जाएँ, तो हजारों किसानों को सामूहिक रूप से कार्बन क्रेडिट का लाभ मिल सकता है।

3. बायोचार (Biochar) के माध्यम से कार्बन क्रेडिट

बायोचार एक स्थायी कार्बन रूप है, जिसे कृषि अपशिष्ट या पिरुल (चीड़ की सूखी पत्तियों) को नियंत्रित ताप पर जलाकर बनाया जाता है। इसे मिट्टी में मिलाने से कार्बन सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहता है।

बायोचार के लाभ:
• मिट्टी की उर्वरता एवं नमी धारण क्षमता बढ़ाता है
• फसल उत्पादन में सुधार करता है
• दीर्घकालिक कार्बन संचयन सुनिश्चित करता है

सॉंग नदी बेसिन में पिरुल की उपलब्धता अधिक होने के कारण बायोचार उत्पादन एक बड़े स्तर का कार्बन क्रेडिट मॉडल बन सकता है। प्रत्येक टन बायोचार लगभग 2–3 टन CO₂ के समतुल्य कार्बन को स्थायी रूप से संग्रहित कर सकता है, जिससे ग्रामीणों को अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।

4. पिरुल आधारित ब्रिकेट्स (Pine Briquettes)

पिरुल से ब्रिकेट्स (ईंधन के ठोस ब्लॉक) बनाना एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक आजीविका स्रोत है।

इसके प्रमुख लाभ:
• जंगलों में आग की घटनाओं में कमी
• पारंपरिक ईंधन (लकड़ी/कोयला) पर निर्भरता में कमी
• स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प
• कार्बन उत्सर्जन में कमी, जिससे कार्बन क्रेडिट प्राप्ति की संभावना

ग्रामीण स्वयं सहायता समूह (SHGs) और किसान उत्पादक संगठन (FPOs) पिरुल ब्रिकेट्स के उत्पादन और विपणन के माध्यम से आय अर्जित कर सकते हैं।

5. ग्रामीणों के लिए समग्र लाभ

इन सभी गतिविधियों (एग्रोफॉरेस्ट्री, बायोचार, SOC सुधार, पिरुल ब्रिकेट्स) को एकीकृत कर सॉंग नदी बेसिन में एक “कार्बन क्रेडिट क्लस्टर मॉडल” विकसित किया जा सकता है। इसके अंतर्गत:
• किसानों को प्रत्यक्ष कार्बन क्रेडिट से आय
• स्थानीय रोजगार के अवसर
• पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु अनुकूलन
• महिलाओं एवं स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी

6. मार्केटिंग एवं क्रियान्वयन

कार्बन क्रेडिट को बेचने के लिए सत्यापन (MRV – Monitoring, Reporting, Verification) प्रणाली विकसित करनी होगी। इसके लिए तकनीकी एजेंसियों के सहयोग से एक मानक प्रोटोकॉल तैयार किया जा रहा है, ताकि किसानों को पारदर्शी और सुनिश्चित लाभ मिल सके।

निष्कर्ष:
सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट आधारित यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बनेगी, बल्कि उत्तराखंड को जलवायु परिवर्तन के प्रति एक मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगी।

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