ज्ञान-वैराग्य को मनुष्य मात्र के भीतर रोपित कर देने वाली परम शक्ति का नाम है, ‘सद्गुरूदेव’- साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती जी


देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की शाखा, 70 इंदिरा गांधी मार्ग, (सत्यशील गैस गोदाम के सामने) निरंजनपुर के द्वारा आज आश्रम प्रांगण में दिव्य सत्संग-प्रवचनों एवं मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। संस्थान के संस्थापक एवं संचालक ‘‘सद्गुरू श्री आशुतोष महाराज जी’’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती जी ने अपने प्रवचनों के द्वारा उपस्थित भक्तजनों को बताया कि संसार में पूर्णसद्गुरू एक अलौकिक सत्ता के रूप में जब अवतार धारण करते हैं तो उनका लक्ष्य ‘धर्म की संस्थापना’ तथा ‘विश्व शांति’ हुआ करता है। वे जब संसार मंे आते हैं तो इन लक्ष्यों को पूर्णरूपेण सिद्ध करके ही जगत में आते हैं, वे तो अपने शरणागत् शिष्यों को इस महान कार्य में सेवा देकर उनका कल्याण किया करते हैं। भगवान शिव स्वयं माता पार्वती से एैसे पूर्ण सद्गुरू की महिमा के संबंध में बताते हैं कि परमानन्द स्वरूप, सर्व सुखों के प्रदाता, ज्ञानमूर्ति, कर्म बंधनों से सर्वथा रहित, आकाश के समान सूक्ष्म और विशाल, जो भाव से भरे भक्त वत्सल सद्गुरू हैं, इनकी महिमा ब्रह्मा, विष्णु तथा मैं स्वयं मुक्त कंठ से गाया करता हूं। एैसे सद्गुरू जीव के भीतर ज्ञान तथा वैराग्य को रोपित कर उसे भव-बंधनों से मुक्त कर दिया करते हैं, उसका आवागमन समाप्त कर दिया करतेे हैं। भगवान शंकर आगे पार्वती जी को कहते हैं कि मैं एैसे परम कल्याणकारी सद्गुरूदेव के चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूं। संसार के एैसे मनुष्य जिनके पास सभी तरह के धन, बल, मान-प्रतिष्ठा, परिवार इत्यादि प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं लेकिन यदि पूर्ण सद्गुरू का जीवन में अभाव है तो यह सब व्यर्थ है-व्यर्थ है-व्यर्थ है। इस धराधाम पर गुरू ही त्रिनेत्रधारी शिव हैं, गुरू ही अप्रकट चार भुजाओं वाले श्री नारायण भगवान विष्णु हैं तथा गुरू ही अप्रत्यक्ष चार मुख वाले ब्रह्मा भी हैं। इन तीनों देवों की आराधना तभी सफल है यदि सर्वप्रथम सद्गुरू की उपासना की गई हो।
प्रत्येक सप्ताह की भांति कार्यक्रम का शुभारम्भ भजनों की भावभीनी प्रस्तुति देते हुए किया गया। संस्थान के संगीतज्ञों ने अनेक हृदयस्पर्शी भजनों का गायन कर संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया। 1. मन में उजियारा कर दो हे गुरूवर दाता, सुन लो प्रार्थना-सुन लो प्रार्थना…… 2. आया दर पे तेरे सुन भगवन मेरे, मेरी लाज रखो- मेरी लाज रखो…… 3. गुरूदेव तुम्हारा स्नेह पाकर, धन्य हुआ है जीवन…….. 4. मोहे लागी लगन गुरू चरणन की, गुरू चरणन की, चरण बिना मोहे कछु न भाए, जग माया सब सपनन की….. 5. तेरे प्रेम को शब्दों में बांध ना पाऊंगा, जब तक हैं प्राण मेेरे गुणगान सदा मैं गाऊंगा….. इत्यादि रसपूर्ण भजनों से खूब समां बांधा गया।
प्रभु अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते- साध्वी ऋतम्भरा भारती जी
भजनों की सारगर्भित व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी ऋतम्भरा भारती जी के द्वारा किया गया। साध्वी जी ने बताया कि ईश्वर के, सद्गुरू के समक्ष जब एक भक्त आर्तभाव से पुकार करता है कि हे परमपिता मैं तो अनेक बुराईयों से, विकारों से भरा हुआ एक अदना सा इंसान हूं और आप सदा भक्तवत्सल एवं करूणानिधान परमशक्ति हो, मुझ मैले को प्रभु उज्जवल कर अपने पावन चरण कमलों में सदा निवास दो, जन्मों-जन्मों से भटक रहे इस अपने अंश को भवसागर से पार करो। हे जगत उद्धारक मुझ पर कृपा करो। भक्त की एैसी पुकार, एैसी प्रार्थना सुन प्रभु उस पर कृपा करने को विवश हो जाया करते हैं। साध्वी जी ने कहा कि भक्त की प्रार्थना प्रभु तक अवश्य पहुंच जाया करती है और प्रभु अपने भक्तों को कभी भी निराश नहीं करते है। सद्गुरू प्रदत्त ज्ञान सूर्य का उदय प्रत्येक मानव के हृदय में होना आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि सनातन ‘ब्रह्म्ज्ञान’ वह दिव्य तकनीक है जिसके द्वारा अंधकार से आच्छादित मानव मन में ईश्वरीय प्रकाश का प्रकट्ीकरण हुआ करता है। इसी के आलोक में मनुष्य को अपनी बुराईयां, अपने विकार दूर करने का सुदृढ़ सम्बल प्राप्त होता है।
माह के प्रथम रविवार पर सदैव होने वाले ‘भण्डारे’ का आज भी आयोजन किया गया। असंख्य भक्तजनों ने भण्डारे का प्रसाद ग्रहण कर अपने जीवन को कृतार्थ किया।

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